Mayank Agarwal : रणजी ट्रॉफी फाइनल में खतरनाक मोड़: कप्तान के सिर के झटके से मचा धुआं, मयंक अग्रवाल ने संभाली स्थिति
हुबई के केएससीए हुबली क्रिकेट ग्राउंड पर जो नज़ारा देखने को मिला, वह क्रिकेट जगत के लिए शर्मनाक साबित हुआ। यह है रणजी ट्रॉफी 2025-26 का फाइनल मुकाबला, जहां जम्मू-कश्मीर की टीम अपने पहले फाइनल में कर्नाटक के खिलाफ लड़ रही थी। लेकिन दूसरे दिन जो हुआ, वह किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देगा कि क्या खेल में अनुशासन पूरी तरह गायब हो गया?

जब क्रिकेट मैदान में हिंसा दिखाई दे गई
कहानी की शुरुआत है 101वें ओवर से। जम्मू-कश्मीर के कप्तान पारस डोगरा बल्ला थाम रहे थे और कर्नाटक के प्रसिद्ध कृष्णा की गेंद का सामना करना पड़ रहा था। डोगरा ने गेंद पर जोरदार चौका जड़ने का प्रयास किया। गेंद उनके बल्ले का बाहरी किनारा छूते हुए स्लिप की ओर दौड़ पड़ी। मामला यहीं खत्म हो जाता अगर गेंद सीधे सीमा तक चली जाती। लेकिन अंतर सिर्फ इतना था कि गेंद स्लिप में खड़े फील्डर के बगल से गुजर गई। और बस, यहीं से शुरू हो गया जो कुछ न होना चाहिए था।
स्ट्राइकर एंड पर खेल रहे खिलाड़ियों के बीच अचानक तीखी आवाजें सुनाई देने लगीं। स्टंप माइक पर जो कुछ कहा जा रहा था, वह भी काफी तीक्ष्ण था। यह शायद स्लेजिंग का ही परिणाम था जो लगातार चल रहा था। पारस डोगरा का धैर्य टूट गया। वह अपने आप को नहीं रोक सके।
डोगरा और कर्नाटक के फील्डर केवी अनीश के बीच हाथापाई की नौबत आ गई। यह वह पल था जब क्रिकेट भूल कर शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करने लगे डोगरा। उन्होंने अनीश के हेल्मेट पर सिर का झटका दे दिया। ऐसा करते ही पूरे मैदान पर सन्नाटा छा गया। और फिर? बस फिर तो भीड़ इकट्ठा होने लगी। सभी को लगा कि यह अब बुरा हो जाएगा। लेकिन तभी कर्नाटक के अनुभवी बल्लेबाज मयंक अग्रवाल ने अपनी समझदारी दिखाई और दोनों खिलाड़ियों के बीच आ गए। उन्होंने माहौल को और गंभीर होने से बचाया।
मयंक अग्रवाल ने संभाली स्थिति
जैसे ही मामला हाथापाई की ओर बढ़ा, कर्नाटक के सीनियर बल्लेबाज Mayank Agarwal तुरंत बीच-बचाव के लिए आगे आए। उन्होंने डोगरा को रोकने की कोशिश की और दोनों खिलाड़ियों को अलग किया। अंपायर भी तुरंत मौके पर पहुंचे और स्थिति को काबू में किया। कुछ देर तक मैदान पर तनाव बना रहा, लेकिन आखिरकार खिलाड़ियों को शांत कराया गया।
जब हम इस घटना को देखते हैं, तो अनायास ही फुटबॉल के महान खिलाड़ी ज़िनेदिन ज़िदान की याद आ जाती है। साल 2006 का विश्वकप फाइनल। जर्मनी में खेला जा रहा था यह महामुकाबला। फ्रांस और इटली के बीच। ज़िदान ने इतालवी खिलाड़ी मार्को मैटेराज़ी को सिर मार दिया था। एक सिर का झटका जिसने विश्वकप के इतिहास को बदल दिया। उन्हें रेड कार्ड दिया गया। फ्रांस हार गया। ज़िदान का शानदार करियर उसी पल में दाग-धब्बे में बदल गया।
माफी मांगी, लेकिन स्वीकार नहीं हुई
जाहिर है कि डोगरा को तुरंत अपने किए का पश्चाताप हो गया। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि उन्होंने अनीश से माफी मांगी भी। लेकिन कर्नाटक के इस फील्डर ने उसे स्वीकार नहीं किया। शायद जख्म बहुत गहरे थे। शायद गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था। इसके बाद कर्नाटक की टीम और भी आक्रामक हो गई। वे बार-बार डोगरा को ललकारते रहे, उनका ध्यान भटकाने की कोशिश करते रहे।
मैच अधिकारियों को तुरंत हस्तक्षेप करना पड़ा। माहौल को शांत कराया गया। दोनों टीमों के कप्तानों और खिलाड़ियों से गंभीर बातचीत की गई। यह वह पल था जब क्रिकेट को क्रिकेट में वापस लाना जरूरी हो गया था।
बता दें कि फाइनल के पहले दिन पारस को काफी चोट आई थी। कर्नाटक के तेज गेंदबाज विजयकुमार वैशाक की उछाल लेती गेंद उनके दस्ताने पर लगी। चोट इतनी गंभीर थी कि उन्हें रिटायर हर्ट हो जाना पड़ा। लेकिन 41 साल के इस अनुभवी खिलाड़ी का जुनून देखिए कि वह अगले दिन फिर से बल्ले के साथ नीचे उतर आए।
और अगर हम उनके स्कोर की बात करें तो? 166 गेंद पर खेलते हुए 8 चौकों की मदद से 70 रन बनाए। यह शायद उस पारी का सबसे धैर्यपूर्ण अध्याय था। लेकिन दुर्भाग्य से, श्रेयस गोपाल की गेंद उन्हें बोल्ड कर गई। फिर भी, डोगरा ने अपनी टीम को मजबूत स्थिति में रखा।
यह भी पढ़े :- Aman Mokhade बन गया विदर्भ का सुपरस्टार, रणजी और विजय हजारे में मचा रहा धमाल
यह सवाल सब के मन में है। क्या पारस डोगरा को सजा मिलेगी? क्या यह घटना फाइनल के नतीजे को प्रभावित करेगी? क्या जम्मू-कश्मीर इतने मजबूत अवस्थान को कायम रख पाएगी? फिलहाल तो टीम की टेकनिकल स्थिति काफी अच्छी है। लेकिन क्रिकेट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। यह मानसिक शक्ति का खेल है। और अभी तो दोनों टीमों का मन थोड़ा विचलित लग रहा है। आने वाले समय में देखना होगा कि कौन सी टीम इस भावनात्मक उतार-चढ़ाव से बेहतर तरीके से निबटती है।

